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Mujhe Ek Paththar Chahie - Details
Mujhe Ek Paththar Chahie
BookSuresh Sharma -Kant / Hasmukh Baradi • 2009
Description
आमुख
एक बच्चे ने अपने पिता से पूछा, "सिनेमा घर में फर्स्ट क्लास सीट सबसे पीछे और थ्येटर में सबसे आगे क्यों होती है ?" पिता ने काफी सोचने-समझने के बाद जवाब दिया, "चूंकि असत्य दूर से और सत्य नजदीक से देखने पर ही अच्छा लगता है।"
इस जवाब में दार्शनिकता भले लगे, परन्तु सच्चाई है। सिनेमा के पर्दे पर छायाएँ ही तो होती हैं, जबकि नाट्य मंच पर सजीव चरित्र अभिनय करते हैं। साधारणतया देखा गया है कि हम लोग सच्चाई देखने सुनने से कतराते हैं। मुझे सत्तर दशक के उन दिनों की याद आती है जब अहमदाबाद के टाउन हॉल आदि जैसे नाट्य गृहों में निरंतन नाटकों का मंचन होता था और उनके बाहर 'हाउसफुल' का बोर्ड देखने में आता था। परन्तु धीरे-धीरे 'हाउसफुल' के बोर्ड हटते गए और थ्येटर खाली होते गए। उनके मुकाबले सिनेमा घरों में भीड़ बढ़ती गई और उनके बाहर 'हाउसफुल' के बोर्ड लगने शुरू हो गए।
कारण बहुत से हैं, पर सच्चाई ये है कि नाटकों की लोक प्रियता बड़े पैमाने पर घटी है। ज्यादातर लोग अपने-अपने घरों में चैनलों से चिपक कर रह गए हैं। एक ओर जहाँ टी. वी. और सिनेमा के पर्दे पर प्रकट होने वाले कलाकार दिनों दिन पैसा और प्रसिद्धि पा लेते हैं, वहीं दूसरी ओर नाटक कार और नाट्य कलाकार थ्येटर का किराया तक भी मुश्किल से निकाल पाते हैं। परिणाम स्वरूप अच्छे-अच्छे नाटक कार, नाट्य क्षेत्र से उदासीन होते गए हैं।
श्री हसमुख बाराड़ी गुजरात के उन गिने-चुने नाटककारों में से हैं, जिनका संपूर्ण जीवन नाट्यकाल के लिए समर्पित रहा है। मैं उनका शुरू से ही प्रशंसक रहा हूँ। जब उनके इन नए नाटक "मुझे एक पत्थर चाहिए" के अनुवाद के लिए पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र उदयपुर द्वारा आंमत्रित किया गया तो मुझे बहुत खुशी हुई। यह नाटक आज के दिग्भ्रांत समाज का सजीव और सचोट चित्रण करता है। इस मूल गुजराती नाटक का मंचन पहली बार बड़ौदा में श्री यशवंत केलकर के निर्देशन में १९९८ में हुआ। तदुपरान्त दूसरा मंचन गैरेज स्टूडियो थ्येटर द्वारा श्री जनक रावल के निर्देशन में १३ जुलाई, १९९९ को किया गया। मुझे विश्वास है हिन्दी जगत में इसका स्वागत होगा।
हिन्दी साहित्य अकादमी, गुजरात के प्रति मैं आभार प्रकट करता हूँ, जिनके आर्थिक अनुदान से इसका प्रकाशन संभव हो सका है।
अहमदाबाद
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